| बाँध दूँ चाँद, आँचल के इक छोर में |
| माँग भर दूँ तुम्हारी सितारों से मैं |
| क्या समर्पित करूँ जन्मदिन पर तुम्हें |
| पूछता फिर रहा हूँ बहारों से मैं |
| गूँथ दूँ वेणी में पुष्प मधुमास के |
| और उनको ह्रदय की अमर गंध दूं, |
| स्याह भादों भरी, रात जैसी सजल |
| आँख को मैं अमावस का अनुबंध दूं |
| पतली भू-रेख की फिर करूँ अर्चना |
| प्रीति के मद भरे कुछ इशारों से मैं |
| बाँध दूं चाँद, आँचल के इक छोर में |
| मांग भर दूं तुम्हारी सितारों से मैं |
| पंखुरी-से अधर-द्वय तनिक चूमकर |
| रंग दे दूं उन्हें सांध्य आकाश का |
| फिर सजा दूं अधर के निकट एक तिल |
| माह ज्यों बर्ष के माश्या मधुमास का |
| चुम्बनों की प्रवाहित करूँ फिर नदी |
| करके विद्रोह मन के किनारों से मैं |
| बाँध दूं चाँद, आँचल के इक छोर में |
| मांग भर दूं तुम्हारी सितारों से मैं |
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